श्रीमद भागवत कथा सुनने उमड़े श्रद्धालु

जयपुर। पावन पवित्र और दिव्य अधिक मास में श्री भाटिया बिरादरी प्रबंध समिति की तरफ से आदर्श नगर के भाटिया भवन में 16 से 24 मई तक 108 श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। समिति के अध्यक्ष अजय गाँधी ने बताया कि शनिवार को कलश यात्रा का आयोजन किया गया। श्रीमद् भागवत कथा के पहले दिन कथा व्यास गोकुल के आचार्य सुरेश शास्त्री ने भागवत महात्म्य, प्रथम स्कन्ध, अधिकार लीला, कुंती स्तुति एवं भीष्म स्तुति का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के प्रारंभ में भगवान वेदव्यास, शुकदेव एवं भगवान श्रीकृष्ण का पूजन कर कथा शुरू हुई। श्रद्धालुओं ने “हरे कृष्ण” एवं “राधे-राधे” के जयकारों के साथ कथा का श्रवण किया। सुरेश शास्त्री ने श्रीमद भागवत महापुराण के महात्म्य का वर्णन करते हुए कहा कि कलियुग में भगवान प्राप्ति का सबसे सरल माध्यम श्रीमद भागवत कथा का श्रवण है। भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप है। जिस स्थान पर भागवत कथा होती है, वहां देवताओं का वास होता है और वातावरण पवित्र हो जाता है। कथा श्रवण से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का संचार होता है। प्रथम स्कन्ध की कथा में बताया गया कि महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद धर्म की स्थापना के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों का मार्गदर्शन किया। इसी दौरान अश्वत्थामा ने क्रोधवश उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को मारने के लिए ब्रह्मशिरा अस्त्र चला दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गर्भ में प्रवेश कर बालक परीक्षित की रक्षा की। इसी कारण राजा परीक्षित को भगवान का विशेष कृपापात्र बताया गया। अधिकार लीला का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद् भागवत सुनने और समझने का अधिकार उसी को प्राप्त होता है जिसके मन में श्रद्धा, भक्ति और विनम्रता होती है। भगवान की कृपा बिना भागवत का वास्तविक रस प्राप्त नहीं हो सकता। कथा में यह भी बताया गया कि राजा परीक्षित को जब श्राप मिला कि सात दिन बाद उनकी मृत्यु होगी तब उन्होंने सभी सांसारिक मोह त्यागकर गंगा तट पर शुकदेव से भागवत कथा श्रवण का निर्णय लिया। यही भागवत श्रवण की महान परंपरा का प्रारंभ माना जाता है। इसके बाद कुंती स्तुति का भावपूर्ण वर्णन किया गया। माता कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा कि विपत्तियां बार-बार आएं क्योंकि संकट के समय ही भगवान के दर्शन और स्मरण होते हैं। उन्होंने भगवान को जगत का पालनहार और भक्तों का रक्षक बताया। कुंती की भक्ति, समर्पण और भगवान के प्रति अटूट विश्वास का प्रसंग सुन श्रद्धालु भावविभोर हो गए। कथा के अंत में भीष्म स्तुति का वर्णन हुआ। जब भीष्म पितामह शैया पर लेटे थे तब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उनके अंतिम दर्शन के लिए गए। भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए उनकी स्तुति की और कहा कि जीवन का अंतिम क्षण भगवान के स्मरण में ही व्यतीत होना चाहिए। उन्होंने धर्म, सत्य और भक्ति का संदेश देते हुए भगवान के चरणों में अपने प्राण समर्पित कर दिए। पहले दिन की कथा के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने भजनों पर भावपूर्ण नृत्य किया और कथा के अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया। उपाध्यक्ष नितिन भाटिया ने बताया कि सोमवार को वराह अवतार चरित्र, दक्ष यज्ञ चरित्र और ध्रुव चरित्र की कथा होगी।

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