महिला आरक्षण सही तभी जब सबको समान मौका मिले– राजेन्द्र सेन

जयपुर। ओबीसी एडवाईजरी काउंसिल के सदस्य एवं ऑल इंडिया कांग्रेस ओबीसी विभाग के पूर्व नेशनल कोर्डिनेटर राजेन्द्र सेन ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण को विधायिकाओं में महिलाओं के अल्प-प्रतिनिधित्व को दूर करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है। लेकिन विपक्ष का मूल प्रश्न पर है कि ये महिलाएं कौन होंगी, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, कौन नहीं होंगी ? सैन ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किसी दया या कृपा का परिणाम नहीं था बल्कि उस गहरी संरचनात्मक वंचना की स्वीकृति था, जिसने सदियों तक इन समुदायों को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा। लेकिन जब बात महिलाओं के आरक्षण की आती है तो महिलाएं एक समान श्रेणी हों, जिनके अनुभव और अवसर एक जैसे हों। वास्तविकता यह है कि एक दलित महिला का जीवन अनुभव एक सवर्णं महिला से भिन्न होता है। यही कारण है कि कोटा के भीतर कोटा की मांग महज प्रतिनिधित्व की अवधारणा को सार्थक बनाने का प्रयास है। इसके अभाव में यह लगभग तय है कि आरक्षण का लाभ मुख्यतः उन महिलाओं तक सीमित रह जाएगा, जो पहले ही अपेक्षाकृत सशक्त हैं सवर्ण, शहरी और राजनीतिक रूप से जुड़ी हुई। सैन के मुताबिक केन्द्र सरकार द्वारा लाया गया महिला बिल महिला सशक्तीकरण का नारा नही बल्कि अभिजात्य वर्ग की शक्ति को और सुदृढ़ करने का माध्यम है। इसका लाभ अकसर प्रभावशाली सामाजिक समूहों की महिलाओं तक ही सीमित रहेगा। वंचित समुदायों की महिलाएं या तो इससे बाहर रहेगी। इसी कारण कोटा के भीतर कोटा की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आनुपातिक आरक्षण सुनिश्चित करना किसी प्रकार का विभाजन नहीं बल्कि लोकतंत्र है। भारतीय संविधान ने बताता है कि वह सामाजिक वास्तविकताओं की जटिलताओं को समाहित करने में सक्षम है। कोटा के भीतर कोटा केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं करता बल्कि शक्ति के संतुलन को बदलने का प्रयास है। साथ ही यह महिलाओं की श्रेणी के भीतर भी मौजूद असमानताओं को भी उजागर करता है।

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