वर्तमान में पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर दिखाई देने लगा है। ऐसे में भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह युद्ध कई नई चुनौतियाँ लेकर आया है। भारत भले ही इस संघर्ष का प्रत्यक्ष पक्ष ना हो लेकिन इसके आर्थिक, सामरिक और सामाजिक प्रभावों से अछूता रहना संभव नहीं है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है या खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिससे परिवहन लागत बढ़ेगी और महंगाई आमजन की कमर तोड़ सकती है। खाद्य पदार्थों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर वस्तु की कीमत प्रभावित होगी। पहले से महंगाई और बेरोजगारी की चुनौती झेल रहे भारतीय मध्यम वर्ग और गरीब तबके पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा। इस युद्ध का दूसरा बड़ा प्रभाव भारत की विदेश नीति पर पड़ सकता है। भारत के ईरान और अमेरिका दोनों के साथ रणनीतिक संबंध हैं। एक ओर अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रक्षा और व्यापारिक साझेदार है, वहीं ईरान भारत के लिए ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिहाज से अहम देश है। ऐसे में भारत के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। किसी एक पक्ष की ओर झुकाव भारत के दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारत को अपनी पारंपरिक “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर कायम रहते हुए शांति और संवाद का समर्थन करना होगा। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। युद्ध की स्थिति गंभीर होने पर वहाँ रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन सकती है। यदि हालात बिगड़ते हैं तो बड़े पैमाने पर भारतीयों की वापसी की आवश्यकता पड़ सकती है। जैसा पहले के युद्धों के दौरान देखा गया। इससे भारत पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ सकता है क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाली विदेशी मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक व्यापार मार्गों पर भी इस संघर्ष का असर पड़ सकता है। होर्मुज जलमार्ग मध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है। यदि वहाँ तनाव बढ़ता है तो समुद्री व्यापार प्रभावित होगा और भारत के आयात-निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
ऐसे समय में भारत को केवल दर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभानी चाहिए। भारत हमेशा से “विश्व शांति” और “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना का समर्थक रहा है इसलिए संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर युद्धविराम, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की पहल का समर्थन करना भारत की जिम्मेदारी और आवश्यकता भी है। यह स्पष्ट है कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष केवल दो देशों का युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक अस्थिरता का संकेत है। भारत के लिए यह समय सतर्क कूटनीति, आर्थिक तैयारी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का है। युद्ध कभी समाधान नहीं देता और स्थायी शांति केवल संवाद और सहयोग से ही संभव है।



